बरसात और तुम


बरसात..…. और तुम

यह सावन की बहती हवा , हर पेड़ पर हरि हरि डालियों का लहंराना फूलों का महकना पंछियों का झूमना इस मौसम को और खुशनुमा बना देती है इसे देखते ही मानो मन प्रफुल्लित होता है।

 लेकिन इस प्यारे मौसम में याद आती है तुम्हारी... 
क्योंकि मेरे लिए इस प्यारे मौसम को सुहाना तो तुम्हारा साथ ही बना देता था...
तुम्हारा हाथ पकड़ के इस बेहकाती हवा में चलना
बिन मौसम बारिश होने पर इन पानी की लहरों के साथ 
जुमना 
अचानक से पड़ी इस ठंडी ठंडी हवा में गरम गरम भुट्टे का स्वाद चखना 
जानबूझकर छतरी को उड़ा कर भिगते हुए घर चले जाना
तुम्हारे साथ गंदे कीचड़ मैं भी उछलना बड़ा मजेदार लगता था… जैसे किसी मेंढक को अपने प्रिंस का हाथ मिलता था।
फिर घर जाकर बालकनी में बैठकर गरम-गरम पकोड़े और अदरक वाली चाय का मजा ही कुछ और था,  साथ में तुम्हारी शायरी मचाती बहुत शोर थी मेरा यह बरसात मे  गाने को गुनगुनाना और तुम्हारा वह बेसुरा ताल पकड़ना बड़ा ही याद आता है .. 
इन सब को फिर से जीने के लिए आज भी मेरी अखियां तरसती है
 मानो यह बरसात जब भी आती है तुम्हारा 
पैगाम ही लाती है 
पास ना होके तुम मेरे यह तुम्हारा एहसास दिलाती है यह बरसात मुझे फिर से तुम्हें मिलाती है… 

-Vaishanavi Tayade


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